vinod upadhyay

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मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

राजनीति में ग्लैमर

एक ओर सोनिया गांधी, मायावती, सुषमा स्वराज, ममता बनर्जी जैसे चेहरे हैं, जिन्होंने जनता के बीच रहकर काम करते हुए राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। वहीं दूसरी ओर गुल पनाग, किरण खेर, मुनमुन सेन, नगमा, जयाप्रदा और हेमा मालिनी जैसे नाम हैं, जिनकी योग्यता यही है कि वे फिल्म जगत से हैं और अपनी सितारा छवि को चुनावों में भुनाना चाहती हैं। इनमें से कुछ चेहरों को छोड़कर बाकी अपनी खुद की सीट पर प्रभावी प्रचार करने लायक नहीं हैं। मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी और फिल्म अभिनेत्री नगमा के साथ रोड शो के दौरान हुए दुर्व्यवहार के चलते लोकतंत्र में ग्लैमर की दुनिया से जुड़े लोगों खासकर महिला सितारों की भूमिका को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। देखा जाए तो इन चुनावों में लोगों को आकर्षित के लिए राजनीतिक दलों में खूबसूरत चेहरों को सामने लाने की होड़ मची है। अधिकांश राजनीतिक दल ग्लैमर जगत के सितारों को अपनी टिकट पर लोकसभा में लाने और चुनाव प्रचार में उनका इस्तेमाल करने में लगे हैं। इस होड़ में यह बात गौण हो गई है कि संसद कोई मनोरंजन का रंगमंच नहीं, बल्कि वह पवित्र स्थान है जहां निर्वाचित प्रतिनिधि जनता की सेवा करते हुए देश को सही दिशा देने का काम करते हैं। यह हमारे लोकतंत्र की विडंबना है कि राजनीतिक दल अब ग्लैमर जगत के खूबसूरत चेहरों के सहारे अपनी चुनावी नैया पार लगाना चाहते हैं। एक ओर हमारी राष्ट्रीय राजनीति में सोनिया गांधी, मायावती, सुषमा स्वराज, ममता बनर्जी जैसे चेहरे हैं, जिन्होंने जनता के बीच रहकर काम करते हुए राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। यही कारण है कि राजनीति के गलियारों में देशहित के नजरिए से उनकी पहचान एक खुशनुमा एहसास कराती रही है। वहीं दूसरी ओर गुल पनाग, किरण खेर, मुनमुन सेन, नगमा, जयाप्रदा और हेमा मालिनी जैसे नाम हैं, जिनकी योग्यता यही है कि वे फिल्म जगत से हैं और अपनी सितारा छवि को चुनावों में भुनाना चाहती हैं। इनमें से कुछ चेहरों को छोड़कर बाकी अपनी खुद की सीट पर प्रभावी प्रचार करने लायक नहीं हैं। ऐसे चेहरों से पूछा जाना चाहिए कि राष्ट्रीय स्तर पर दबे-कुचले, पिछड़े, आदिवासी, वनवासी, अल्पसंख्यक, दियारा क्षेत्रों में मंहगाई और दूसरी गंभीर समस्याओं से कराह रहे जनजीवन का स्तर सुधारने के लिए उनके पास क्या योजनाए हैं? महानगरीय सभ्यता के अलावा छोटे शहरों और गांवों के विकास के लिए उनकी क्या सोच है? इन क्षेत्रों में महिलाओं को उनका हक और खुशहाल जीवन देने के लिए वे कितना योगदान दे सकेंगी? यूं राजनीति में सौंदर्य तारिकाओं का आना कोई नई बात नहीं है। इसकी शुरुआत दक्षिण भारत से हुई थी, जहां तमिलनाडु में जयललिता फिल्मी दुनिया को छोड़ राजनीति में आईं और सत्ता के शिखर तक पहुंचीं। हालांकि फिल्म लाइन से आकर राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाने के मामले में जयललिता अभी भी एक अपवाद हैं। बहरहाल, यह सोचना बेमतलब लगता है कि जाति, धर्म और क्षेत्रवाद के माहौल में इन सुंदरियों की अपील पर मतदाता अपनी सोच को बदलते हुए किसी दूसरे को वोट दे देता है। यहां कुछ बातें और भी दिखतीं हैं। इन चुनिंदा हस्तियों को टिकट देकर और प्रचारक बनाकर चुनाव में प्रचार कराने में काफी फर्क हैं। प्रचारक के रूप में अभिनेता/अभिनेत्रियों को पार्टियों की ओर से मेहनताने के तौर पर दी गई धनराशि और दूसरी सुविधाएं इतनी अधिक हो जाती हैं कि उम्मीदवारों के चुनाव आयोग की जद में आ जाने का खतरा बढ़ जाता है। दूसरी ओर उन्हें पार्टी में सदस्य के रूप में शामिल कर लेने के बाद वह खतरा और उनके कारण उठने वाले कई दूसरे विवाद खुद ही खत्म हो जाते हैं। पर ग्लैमर जगत से राजनीति में आई इन हस्तियों के संदर्भ में हमें यह भी देखना होगा कि चुनावी जनसभाओं में भीड़ जुटाना और उसे वोटों में तब्दील करना दो बिलकुल जुदा बातें हैं। याद करें देश के सबसे दिलचस्प और लोकप्रिय राजनेताओं में से एक लालू प्रसाद यादव की बिहार और उसके पड़ोसी राज्यों में होने वाली रैलियों को। लालू की मसखरीपूर्ण शैली की वजह से रैलियों में उन्हें देखने-सुनने के लिए बड़े पैमाने पर भीड़ एकत्र होती है। लेकिन लालू भारी भीड़ के एक छोटे हिस्से को भी वोटों में बदलने के मामले में अक्सर असफल रहते हैं। ऐसा ही कुछ ग्लैमर जगत के सितारों के मामले में भी है। लाखों लोगों की भीड़ वाली जनसभाओं में भी देश के भविष्य को लेकर राजनेताओं के भाषण सुनने की अपेक्षा इन अभिनेताओं/अभिनेत्रियों को देखने की ललक ज्यादा होती है। इतना ही नहीं, राजनीति में आने वाले सितारों में ज्यादातर वे ही होते हैं, जिनको ग्लैमर की दुनिया में कड़े संघर्ष के चलते काम मिलना कम हो जाता है। उनका पेशा ढलान पर होता है अथवा पहले से चले आ रहे पेशे से मन उचट गया होता है। इनके राजनीति में आने पर किसी को एतराज नहीं। पर लोगों को इनके सितारा आकर्षण से इतर यह देखना चाहिए कि ये जनता की समस्याओं के प्रति कितने संवेदनशील हैं और इनमें राजनीतिक क्षेत्र में काम करने की कितनी योग्यता और जज्बा है।

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